Thursday, July 25आदिवासी आवाज़

झारखंड में आदिवासियों के साथ राजनीति

NAGADA : The Adiwasi Media

Article by Purnendu Pushpesh

झारखंड में राजनीति और आदिवासी समुदायों के बीच संबंध जटिल हैं और पिछले कुछ वर्षों में विकसित हुए हैं। झारखंड में एक महत्वपूर्ण आदिवासी आबादी है, और उनकी राजनीतिक भागीदारी और मुद्दे राज्य के राजनीतिक परिदृश्य में बहुत महत्वपूर्ण हैं। झारखंड में आदिवासी समुदायों से जुड़ी राजनीति के संबंध में कुछ प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं:

जनजातीय प्रतिनिधित्व: झारखंड में जनजातीय समुदायों के लिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए आरक्षण प्रणाली लागू है। राज्य विधान सभा और संसद में कुछ प्रतिशत सीटें अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के लिए आरक्षित हैं। इससे आदिवासी नेताओं और प्रतिनिधियों को राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का मौका मिला है।

आदिवासी राजनीतिक दल: झारखंड में कई राजनीतिक दल हैं जो मुख्य रूप से आदिवासी मुद्दों पर केंद्रित हैं और आदिवासी नेता सबसे आगे हैं। झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) मजबूत आदिवासी आधार वाली एक ऐसी पार्टी है. ये पार्टियाँ आदिवासी समुदायों के अधिकारों और विकास की वकालत करती हैं। इसके अलावा आदिवासी विकास परिषद्, झारखंड मुक्ति मोर्चा – उलगुलान (जेएमएम-यू), ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (एजेएसयू), झारखंड पीपुल्स पार्टी, झारखंड पार्टी (एनोश एक्का), झारखंड पार्टी (होरो), झारखंड पार्टी (नरेन), यूनाइटेड झारखंड पार्टी, ऑल इंडिया झारखंड पार्टी, झारखंड जन क्रांति मोर्चा, हुल झारखंड पार्टी, प्रगतिशील हुल झारखंड पार्टी, राज्य हुल झारखंड पार्टी, बिरसा सेवा दल, राष्ट्रीय सेंगेल पार्टी, आदिवासी-मूलवासी जनाधिकार मंच आदि राजनीतिक दल भी अपने अपने स्तर  से आदिवासियों की लड़ाई लड़ रहे हैं।

आदिवासी आंदोलन: झारखंड में स्वायत्तता और संसाधनों पर नियंत्रण के लिए आदिवासी आंदोलनों का इतिहास रहा है। इन आंदोलनों का राज्य की राजनीति पर खासा असर पड़ा है. झारखंड में आदिवासी आंदोलन एक महत्वपूर्ण और प्रभावशाली सामाजिक और राजनैतिक आंदोलन का हिस्सा है, जो आदिवासी समुदायों के हकों और विकास के मुद्दों को उठाता है। झारखंड राज्य के गठन से पहले और उसके बाद भी, यहां के आदिवासी समुदायों ने कई आंदोलन और गतिविधियों के माध्यम से अपने हकों की रक्षा की हैं। झारखंड में आदिवासी आंदोलनों के माध्यम से आदिवासी समुदायों ने अपने सामाजिक, आर्थिक, और सांस्कृतिक अधिकारों की रक्षा की हैं और उनके लिए न्याय और समानता की मांग की है। ये आंदोलन आदिवासी समुदायों के विकास और सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं और राजनीतिक दलों और सरकार को उनके मुद्दों को समझने और समर्थन देने के लिए प्रेरित करते हैं। किन्तु अब इनमे से अनेक दल व्यावसायिक से हो गए हैं और आदिवासियों के सच्चे हितैषी नहीं रहे।

संसाधन संघर्ष: झारखंड खनिज संसाधनों से समृद्ध है, और इन संसाधनों के निष्कर्षण के कारण अक्सर आदिवासी समुदायों के साथ संघर्ष होता है। संसाधन आवंटन, खनन और पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी राजनीति राज्य के राजनीतिक एजेंडे के केंद्र में हैं।

कल्याण कार्यक्रम: राजनीतिक दल अक्सर जनजातीय समुदायों के बीच समर्थन हासिल करने के लिए कल्याण कार्यक्रमों और विकास के वादों का उपयोग करते हैं। राजनीतिक अभियानों में शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, रोजगार और बुनियादी ढांचे के विकास से संबंधित मुद्दों पर अक्सर चर्चा की जाती है।

गठजोड़ और गठबंधन : राज्य की राजनीति में गठजोड़ और गठबंधन की अहम भूमिका होती है. आदिवासी वोटों को सुरक्षित करने और सरकार बनाने के लिए पार्टियाँ अक्सर आदिवासी-केंद्रित पार्टियों के साथ गठबंधन बनाती हैं।

चुनौतियाँ: आरक्षित सीटों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के बावजूद, कई चुनौतियाँ बनी हुई हैं। भ्रष्टाचार, नीतियों का अप्रभावी कार्यान्वयन और संसाधन वितरण पर विवाद जैसे मुद्दे आदिवासी समुदायों की भलाई को प्रभावित करते रहते हैं।

सशक्तिकरण: आदिवासी समुदायों को राजनीतिक और आर्थिक रूप से सशक्त बनाना एक लक्ष्य है। राजनीतिक जागरूकता बढ़ाने, आदिवासी नेतृत्व को बढ़ावा देने और आदिवासी कल्याण के उद्देश्य से नीतियों के प्रभावी कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के प्रयास जारी हैं।

झारखंड में आदिवासी समुदायों के साथ घटिया राजनीति के कई घटक हैं, जिनमें समाजिक, आर्थिक, और सांस्कृतिक दुश्मनी शामिल है। यहां कुछ मुख्य कारण और घटिया प्रक्रियाएँ हैं:

  1. भूमि अधिग्रहण और आदिवासी समुदायों का विस्थापन: झारखंड में अक्सर आदिवासी समुदायों को उनकी जन्मभूमि से विस्थापित करने के लिए सरकार की नीतियों और कार्रवाइयों का शिकार बनाया गया है। उन्हें अवशोषण का सामना करना पड़ता है, जिससे उनकी आजीविका की हानि और सांस्कृतिक टूटने का खतरा होता है।
  2. वनवासी समुदायों के अधिकारों की कमजोरी: वनों के अधिकारों के बावजूद, झारखंड में आदिवासी समुदायों को अपने वनस्पति और जलवायु संसाधनों के अधिकार को प्राप्त करने में कई समस्याएँ आई हैं।
  3. शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता की कमी: झारखंड के कई आदिवासी इलाकों में शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए उचित संरचना नहीं है। पूर्णकर्ता क्रियान्वयन नीतियों के बावजूद, आदिवासी समुदायों को गुणवत्ता वाली शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की बराबरी का अधिकार नहीं है।
  4. संसाधन शोषण: झारखंड के आदिवासी क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधनों के शोषण का प्रबंधन अक्सर गैर-आदिवासी संगठनों और निगमों के लाभ में होता है, जबकि आदिवासी समुदायों को कम लाभ होता है।
  5. भूमि हस्पतालन: विशेषज्ञ वर्गों या राजनीतिक संघों के दबाव में आदिवासी समुदायों की भूमि का अवैध उपयोग और कब्जा किया जाता है, जिससे आदिवासी समुदायों को भूमि रहित और असमान बनाया जाता है।

ये घटिया राजनीतिक प्रथाएँ आदिवासी समुदायों के लिए सामाजिक और आर्थिक रूप से कठिनाइयों का सामना करने के कारण बनती हैं और इन मुद्दों को हल करने के लिए सरकार और समाज के साथी संगठनों के ईमानदार सहयोग की आवश्यकता होती है। कुल मिलाकर, झारखंड में आदिवासी समुदायों के साथ राजनीति ऐतिहासिक, सामाजिक और आर्थिक कारकों से प्रभावित होती है। राज्य के राजनीतिक परिदृश्य की विशेषता मुख्यधारा के राजनीतिक दलों और विशेष रूप से आदिवासी हितों को पूरा करने वाले दलों के बीच संतुलन नहीं है। निर्णय लेने की प्रक्रिया में आदिवासी समुदायों की सार्थक भागीदारी सुनिश्चित करना और उनकी अनूठी चिंताओं को संबोधित करना झारखंड की राजनीति का महत्वपूर्ण पहलू बना हुआ है।