Thursday, July 25आदिवासी आवाज़

आदिवासी संस्कार

केंद्रीय सरना समिति ने समीर उरांव को लोहरदगा लोकसभा भाजपा प्रत्याशी बनने पर दी बधाई

केंद्रीय सरना समिति ने समीर उरांव को लोहरदगा लोकसभा भाजपा प्रत्याशी बनने पर दी बधाई

Breaking News, आदिवासी, आदिवासी संस्कार, झारखण्ड, राजनीति
रांची : शुक्रवार को केंद्रीय सरना समिति के प्रतिनिधि मंडल अध्यक्ष बबलू मुंडा के अगुवाई में अगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा के लोहरदगा लोकसभा के प्रत्याशी एवं राज्यसभा के पूर्व सांसद समीर उरांव से रांची स्थित आवास में मुलाकात कर लोहरदगा लोकसभा के प्रत्याशी बनाए जाने पर सरना अंग वस्त्र एवं पुष्पगुच्छ भेंट कर उन्हें बधाई एवं शुभकामनाएं दी गई। केंद्रीय सरना समिति के अध्यक्ष बबलू मुंडा ने कहा कि आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा झारखंड के सभी सीटों पर जबरदस्त अंतर जीत हासिल करेगी। पूरे देश के आदिवासियों को देश के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भरोसा एवं विसवास है। झारखंड के आदिवासी एवं मूलवासी समाज झारखंड लोकसभा के सभी सीट जिताकर भाजपा के झोली में देगी। इस कार्यक्रम में मुख्य रूप से सिसई विधानसभा के पूर्व विधायक शिव शंकर उरांव, केंद्रीय सरना समिति के अध्यक्ष बबलू मुंडा, मुख्य पहान जगलाल पहा...
आदिवासी समाज को सीखना होगा ‘आदिवासियत’ और ‘आधुनिकता’ में संतुलन बनाना

आदिवासी समाज को सीखना होगा ‘आदिवासियत’ और ‘आधुनिकता’ में संतुलन बनाना

Breaking News, आदिवासी, आदिवासी संस्कार, विचार
अनेक मंच और विश्व पटल पर जब भी किसी आदिवासी समाज की बात होती है तो अमूमन एक जंगल में निवास करने वाला और विचित्र वेशभूषा के साथ अपने त्वचा को रंगा एक छवि प्रस्तुत की जाती है। 21 वीं शताब्दी में भी विशाल जनमानस आदिवासी को जंगली ही मानते हैं। परिवर्तन एक अटूट सत्य है और जब सभी समाजों में परिवर्तन हुआ है, तो आदिवासी समाज में भी परिवर्तन क्यों नहीं होना चाहिए? लोग अचंभित होते हैं जब एक आदिवासी ‘वृहद् समाज’ का अंग बनता है। आदिवासी समाज में भी परिवर्तन हुआ है, किंतु वह धीमी गति से हुआ है। इसका एक ठोस वैज्ञानिक कारण है। पुरातत्व मानवशास्त्र में एक विख्यात सिद्धांत है। पुरातन काल में मनुष्य की आवश्यकताएँ सीधे प्रकृति से पूरी होती थी। मनुष्य आवश्यकता अनुरूप प्रकृति से संसाधन प्राप्त करता था। धीरे धीरे यह आवश्यकता पूंजीवाद में बदला और फिर प्रकृति का दोहन अनियंत्रित हो गया। औद्योगिक क्रांति के बाद ...
सरहुल का विज्ञान: प्रकृति का विवाह

सरहुल का विज्ञान: प्रकृति का विवाह

Breaking News, आदिवासी संस्कार
  आदिवासी और प्रकृति पर्यायवाची हैं। आदिवासी समाज को यह भली भाँति पता है कि जब तक प्रकृति का सानिध्य है, उनका अस्तित्व बना हुआ है। प्रकृति का स्वस्थ होना उनके जीवन शैली के स्वस्थ होने का संकेत है। आदिवासी संस्कृति में ऐसे अनेक प्रकार के गतिविधियाँ और क्रियाकलाप हैं जो यह दर्शातेबहै कि प्रकृति उनसे अलग नहीं, अपितु उनके ही जीवन का एक अहम हिस्सा है। आदिवासियों के प्रकृति प्रेम के अनेक गतिविधियों में से सबसे प्रमुख ‘सरहुल’ है। सरहुल झारखंड के आदिवासियों का एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक पर्व है। यह मात्र बसंत ऋतु के आगमन का संकेत नहीं है, जैसा कि अन्य समाज इसे देखते हैं। इस महापर्व के अनुभव के समय जो विधि विधान किए जाते हैं वो अपने आप में बड़ा रोचक और अर्थपूर्ण हैं। जब हम इसे निकट से देखते हैं तो आदिवासी समाज में अंतर्निहित विज्ञान और उनके समृद्ध अवधारणाओं से हमारा परिचय होता है। जो सांस्कृति...
विश्व आदिवासी दिवस का इतिहास

विश्व आदिवासी दिवस का इतिहास

आदिवासी संस्कार, विचार
Article by Dr. Abhay Sagar Minz पूरे विश्व में लगभग 37 करोड़ आदिवासी हैं। 13 सितम्बर 2007 को विश्व भर के आदिवासियों के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण दिन था। इसी दिन संयुक्त राष्ट्र संघ ने, आदिवासियों के अधिकार का संयुक्त राष्ट्र के घोषणा पत्र (यूएनड्रिप) को अंगीकृत किया था। घोषणा पत्र के शुरुआत में ही कहा गया है कि आदिवासी समुदाय को अन्य समुदायों की भाँति ही बराबरी का दर्जा मिलना चाहिए। आदिवासी समाज में विविधता है और वे एक विशिष्ट भाषा एवं संस्कृति को मानने वाले समाज हैं। इस विविधता का सम्मान होना चाहिए। आदिवासी समुदाय को उनकी विशिष्ट संस्कृति और जीवन शैली के आधार पर कोई भी राष्ट्र उनसे भेदभाव नहीं कर सकता है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस तथ्य पर भी चिंता जतायी कि बाहरी समुदाय के द्वारा आदिवासी समुदाय के जल जंगल और ज़मीन के दोहन का एक ऐतिहासिक क्रम रहा है और फलस्वरूप आदिवासी समुदाय ने निरंतर दर्द...