राजेश की खोरठा कविता – नारी

आकाशवाणी हजारीबाग से प्रसारित (25 अगस्त 1998)

 

“नारी”

“आँचल में है दूध आंखों में पानी”
पढ़ल हों-
तोर तियाग, सेवा आर बलिदानेक निसानी
नारी तोर एहे कहानी।

तो ममताक मूरती हें
मानुसेक हें तोय माँइ
मेंतुक तोर सेवा नाय करे परानी
नारी तोर एहे कहोनी ।

कोनो दिन तो माँइ बनइकें
गीदर -बुतरुक गीत सुनवाई
कोनो दिन संगिनी बइनकें.
मरद के तोंय मन जुड़वले
तोंय मानुसेक भुख मेंटवई
सहइकें आपन गोटे हानि
कि नारी तोर एहे कहानी ?

ममता तोरा में भर जाहे जब
बरिसावेइं घर मे अमरित तबू ।
सनेह आर “आदर्श” बाहाइकें
घर के बनव हैं सरग तब |

तोर बिन जीनगी बेकार भइ जाहे
तोर बिन उन्नति अथुरा रइह जाहे
डहर देखउआ बइनके तोय डहर देखवई
करे जखन लोक मनमानी।
कभूं कभूं तोंय बहिन बइनकें
हाथें राखी पहिरावेई
सइ राखिक लजेक कतना
दहेज लोभी कुकुर सें
बचवे पारे है परनी ?
दइ-देहें आपन कुरबानी ?

सोंच नारी सोंच, अभूं तनी सोंच
बनवाई एक लोतन कहानी
आपन जाइतेक अमर निसानी।

नारी तोर एहे कहानी।
नारी तोर एहे निसानी।।

 

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