29 जनवरी : जब काग़ज़ ने सत्ता से सवाल करना शुरू किया

NAGADA : The Adiwasi Media

हर साल 29 जनवरी आता है और चला जाता है। ज़्यादातर लोगों के लिए यह बस एक और तारीख़ होती है, लेकिन पत्रकारिता से जुड़े लोगों के लिए, और सच पूछिए तो लोकतंत्र को समझने वालों के लिए, यह तारीख़ बहुत भारी मायने रखती है। इसी दिन को भारतीय समाचार पत्र दिवस कहा जाता है।
यह दिन हमें याद दिलाता है कि भारत में अख़बार सिर्फ़ खबरें छापने के लिए पैदा नहीं हुए थे, बल्कि सवाल पूछने, सत्ता को आईना दिखाने और आम आदमी की आवाज़ बनने के लिए जन्मे थे।

आज जब हम सुबह उठते हैं, मोबाइल उठाते हैं, व्हाट्सएप स्क्रॉल करते हैं, यूट्यूब खोलते हैं और फिर कहीं जाकर अख़बार की तरफ़ नज़र डालते हैं, तो लगता है कि अख़बार कोई पुरानी चीज़ हो गई है। लेकिन ज़रा रुकिए। अगर आज अख़बार होते ही नहीं, तो क्या होता? कौन सत्ता से लगातार पूछता कि “ये क्यों हुआ?”, “ये किसके लिए हुआ?” और “इसका नुकसान किसे होगा?”

कहानी शुरू होती है 1780 से

29 जनवरी 1780। जगह—कलकत्ता। न आज़ाद भारत, न लोकतंत्र, न संविधान। चारों तरफ़ ईस्ट इंडिया कंपनी का राज, अफ़सरों की मनमानी और आम लोगों की कोई सुनवाई नहीं। ऐसे माहौल में एक आदमी खड़ा होता है –जेम्स ऑगस्टस हिक्की
यह आदमी कोई क्रांतिकारी नेता नहीं था, न किसी आंदोलन का चेहरा। इसके पास बस एक चीज़ थी -कलम, काग़ज़ और हिम्मत।

हिक्की ने उसी दिन एक अख़बार निकाला, जिसका नाम था ‘बंगाल गजट’, जिसे लोग प्यार और ग़ुस्से में ‘हिक्की का गजट’ कहने लगे।
आज सुनकर अजीब लगता है, लेकिन यह अख़बार सिर्फ़ भारत का नहीं, बल्कि पूरे एशिया का पहला छपा हुआ समाचार पत्र था।

सोचिए, जब यहां लोग अख़बार क्या होता है, ये भी नहीं जानते थे, तब एक आदमी कह रहा था—“मैं वो छापूंगा जो सत्ता को पसंद नहीं आएगा।”

अख़बार जो किसी से डरता नहीं था

हिक्की का गजट कोई सरकारी विज्ञापन छापने वाला, अफ़सरों की तारीफ़ करने वाला अख़बार नहीं था। उसके माथे पर जो लाइन छपी रहती थी, वही उसकी असली पहचान थी – “सबके लिए खुला, लेकिन किसी के दबाव में नहीं।”

आज यह लाइन हमें साधारण लग सकती है, लेकिन उस दौर में यह सीधी बग़ावत थी।
हिक्की खुलेआम ईस्ट इंडिया कंपनी के अफ़सरों की रिश्वतखोरी, ऐशो-आराम, सत्ता के दुरुपयोग और नैतिक पतन पर लिखता था। उसने गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स तक को नहीं छोड़ा। उनकी नीतियों, उनके व्यवहार और यहां तक कि उनके निजी जीवन पर भी सवाल उठाए।

आज के ज़माने में अगर कोई पत्रकार ऐसा करे, तो उस पर ट्रोलिंग होगी, नोटिस आएगा, चैनल बंद होगा। लेकिन तब सीधे जेल होती थी।

गॉसिप, राजनीति और सच…..सब कुछ

हिक्की का अख़बार आज के अख़बारों जैसा “सीरियस” नहीं था। उसमें राजनीति थी, व्यापार था, लेकिन साथ ही गॉसिप भी थी।
किस अफ़सर की किससे नज़दीकियां हैं, कौन किस पार्टी में क्या करता है, कौन सत्ता का फायदा उठा रहा है…..सब कुछ छपता था।

आज हम जिस “इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज़्म” की बात करते हैं, उसकी कच्ची लेकिन साहसी शुरुआत वहीं से हुई।
हिक्की जानता था कि सच सिर्फ़ फाइलों में नहीं, लोगों की ज़िंदगी में छिपा होता है।

जेल से भी छपता रहा अख़बार

जब सत्ता का धैर्य टूट गया, तो हिक्की को जेल भेज दिया गया।
लेकिन यहीं से वह इतिहास बन गया।

जेल में बैठकर भी उसने अख़बार लिखना बंद नहीं किया। सोचिए, सलाखों के पीछे से सत्ता को चुनौती देना -यह कोई साधारण बात नहीं है।
आख़िरकार अंग्रेज़ सरकार ने उसका प्रिंटिंग प्रेस ही जब्त कर लिया। दो साल के भीतर अख़बार बंद हो गया।

हिक्की हार गया, लेकिन उसकी लड़ाई अमर हो गई।

एक पत्रकार की दर्दनाक मौत

हिक्की की कहानी किसी फिल्मी हीरो जैसी नहीं है।
अख़बार बंद हुआ, पैसे खत्म हुए, कोई साथ देने वाला नहीं बचा। कहा जाता है कि उसकी मौत एक जहाज़ पर हुई और उसके पास अंतिम संस्कार तक के पैसे नहीं थे।

लेकिन इतिहास में नाम पैसों से नहीं, साहस से लिखा जाता है।
हिक्की का नाम इसलिए जिंदा है क्योंकि उसने पहली बार बताया कि अख़बार सत्ता का नौकर नहीं, जनता का सवाल होता है।

आज के अख़बार: क्या बदला, क्या नहीं

अब ज़रा आज पर आते हैं।
आज अख़बार रंगीन हैं, मोटे हैं, तकनीक से लैस हैं। खबरें सेकंडों में पहुंचती हैं। लेकिन सवाल वही है -क्या अख़बार आज भी उतने ही निर्भीक हैं?

सच यह है कि आज अख़बार सिर्फ़ खबरें नहीं देते। वे समाज को दिशा देते हैं। राजनीति से लेकर खेती तक, शेयर बाज़ार से लेकर अंतरिक्ष तक -हर विषय पर गहराई से लिखते हैं।
एक वायरल पोस्ट आपको उत्तेजित कर सकती है, लेकिन अख़बार आपको सोचने पर मजबूर करता है।

डिजिटल मीडिया तेज़ है, लेकिन अक्सर अधूरा है। अख़बार धीमा है, लेकिन ठहराव देता है।

सुबह की चाय और अख़बार

आज भी बहुत से घरों में सुबह की शुरुआत अख़बार से होती है।
वह काग़ज़ सिर्फ़ खबर नहीं देता, वह आदत बनाता है….पढ़ने की, समझने की, तुलना करने की।

इसी वजह से कुछ राज्य सरकारों ने स्कूलों में अख़बार पढ़ने की पहल की है। हिमाचल प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों ने बच्चों को सुबह की प्रार्थना सभा में अख़बार पढ़ने की आदत डलवाने का फैसला किया।
यह कदम इसलिए ज़रूरी है क्योंकि सोशल मीडिया बच्चों को बोलना तो सिखा रहा है, लेकिन सोचकर बोलना नहीं।

अख़बार और लोकतंत्र

लोकतंत्र सिर्फ़ चुनाव से नहीं चलता।
वह सवालों से चलता है। और सवालों की सबसे मजबूत ज़मीन अख़बार ही होते हैं।

जब अख़बार कमजोर होते हैं, तो अफ़वाहें मजबूत होती हैं।
जब अख़बार डरते हैं, तो सत्ता बेलगाम होती है।

हिक्की के समय अख़बार सत्ता से लड़ रहा था। आज भी उसकी जिम्मेदारी वही है—बस हथियार बदले हैं।

आख़िरी बात

29 जनवरी सिर्फ़ एक तारीख़ नहीं है।
यह याद दिलाने का दिन है कि एक आदमी, एक प्रेस और कुछ पन्ने इतिहास बदल सकते हैं।

हिक्की का गजट उस आग की पहली चिंगारी था, जिसने भारत में सवाल पूछने की परंपरा शुरू की।
आज अगर हम अख़बार पढ़ते हैं, लिखते हैं या उस पर भरोसा करते हैं, तो वह उसी चिंगारी का विस्तार है।

अख़बार तब भी सच का साथी था,
अख़बार आज भी सच का साथी है –
बस ज़रूरत है उसे समझने और बचाए रखने की।