डीपीएस बोकारो में सीबीएसई की क्षमता-निर्माण कार्यशाला आयोजित

 

जीवन कौशल के जरिए शिक्षकों ने सीखी भविष्य संवारने की तकनीक

बोकारो : शिक्षा केवल किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह विद्यार्थी को जीवन की चुनौतियों के लिए तैयार करने का माध्यम है। इसी उद्देश्य के साथ सीबीएसई के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस, पटना की ओर से डीपीएस बोकारो में जीवन-कौशल (लाइफ स्किल्स) विषय पर एकदिवसीय क्षमता निर्माण कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस कार्यशाला में शिक्षकों को पेशेवर रूप से सशक्त बनाने और शिक्षण-पद्धति में जीवन कौशलों को शामिल करने पर बल दिया गया, ताकि इसका सीधा लाभ विद्यार्थियों को मिल सके। कार्यशाला की संसाधन सेवी (रिसोर्स पर्सन) एमजीएम हायर सेकेंडरी स्कूल की उपप्राचार्या राखी बनर्जी एवं वरीय शिक्षिका कंचन सिंह ने इस बात पर विशेष बल दिया कि जीवन कौशल कार्यक्रम शिक्षा के लक्ष्यों को प्राप्त करने का एक मार्ग है, जो साक्षरता को वास्तविक शिक्षा से जोड़ता है।

उन्होंने कहा कि शैक्षणिक उपलब्धि और जीवन-कौशल एक-दूसरे के पूरक हैं। शिक्षण और अध्यापन में जीवन-कौशल एक मार्गदर्शक की भूमिका निभाते हैं, जो केवल किताबी ज्ञान को व्यवहार में बदलने का काम करते हैं। उन्होंने प्रभावी संचार, सहानुभूति और समानुभूति, आलोचनात्मक सोच, समस्या-समाधान, तनाव-प्रबंधन जैसे जीवन-कौशल के विभिन्न पहलुओं से अवगत कराया।

प्रशिक्षण सत्र के दौरान कई रोचक और व्यावहारिक गतिविधियां आयोजित की गईं। शिक्षकों ने पाठ्यक्रम से जुड़े विषयों पर लेसन प्लान तैयार किए और किसी समस्या की पहचान कर उसके समाधान हेतु एक्शन प्लान बनाने की रणनीति सीखी। संसाधन सेवियों ने अपने जीवन के अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि कक्षा में बच्चों के साथ जुड़ाव कैसे बनाए रखा जाए। उन्होंने छात्रों में जिज्ञासा जगाने, प्रयास की शक्ति पर जोर देने और रचनात्मक फीडबैक का माहौल बनाने के अनूठे तरीके भी साझा किए।

विद्यालय के प्राचार्य डॉ. ए.एस. गंगवार ने इस प्रकार की कार्यशाला को नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के उद्देश्यों के अनुरूप महत्वपूर्ण बताया। कहा कि जीवन-कौशल साक्षरता और वास्तविक ज्ञान के बीच का सेतु हैं, जो विद्यार्थियों को न केवल परीक्षाओं के लिए, बल्कि जीवन की हर चुनौती के लिए तैयार करते हैं। इन कौशलों का सबसे बड़ा लाभ यह है कि ये शिक्षा को बोझिल होने से बचाते हैं और सीखने की प्रक्रिया को आनंदमय बनाते हैं। जब शिक्षक स्वयं इन कौशलों से लैस होंगे, तभी वे कक्षा में एक उत्साहजनक और सहायक शिक्षण वातावरण तैयार कर सकेंगे।