पटना। बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव का परिणाम निश्चित रूप से राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे पूरे बिहार के मतदाताओं का व्यापक जनादेश या आगामी विधानसभा चुनाव की दिशा का निर्णायक संकेत मानना तार्किक नहीं होगा। किसी भी उपचुनाव का परिणाम उस समय की स्थानीय परिस्थितियों, उम्मीदवारों, संगठनात्मक समीकरणों, स्थानीय मुद्दों और मतदान के स्तर से प्रभावित होता है। इसलिए बांकीपुर के परिणाम से राजनीतिक संकेत तो निकाले जा सकते हैं, लेकिन उसके आधार पर पूरे राज्य के मतदाताओं के मन की अंतिम व्याख्या करना जल्दबाजी होगी।
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि उपचुनाव और आम विधानसभा चुनाव की प्रकृति अलग होती है। आम चुनाव में मतदाता सरकार बनाने के व्यापक मुद्दों पर मतदान करता है, जबकि उपचुनाव में किसी एक सीट के प्रतिनिधि का चुनाव प्रमुख होता है। स्थानीय समीकरण, व्यक्तिगत लोकप्रियता, उम्मीदवार की स्वीकार्यता, जातीय और सामाजिक समीकरण तथा स्थानीय असंतोष कई बार राष्ट्रीय या राज्यस्तरीय राजनीतिक धारणाओं पर भारी पड़ जाते हैं। इसलिए बांकीपुर में किसी दल की जीत या हार को पूरे बिहार के राजनीतिक रुझान का पैमाना बनाना उचित नहीं होगा।
भारतीय राजनीति में इसके पर्याप्त उदाहरण मौजूद हैं। वर्ष 2018 में उत्तर प्रदेश की गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीटों के उपचुनाव में भाजपा को हार मिली थी। गोरखपुर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का राजनीतिक गढ़ रहा था, जबकि फूलपुर से तत्कालीन उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य सांसद रह चुके थे। इसके बावजूद अगले वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने उत्तर प्रदेश में उल्लेखनीय प्रदर्शन किया और 2022 के विधानसभा चुनाव में भी सत्ता बरकरार रखी। इससे स्पष्ट होता है कि किसी उपचुनाव में मतदाताओं का व्यवहार तत्कालीन परिस्थितियों से प्रभावित हो सकता है और उसे भविष्य के आम चुनाव का निश्चित संकेत नहीं माना जा सकता।
महाराष्ट्र के कस्बा पेठ विधानसभा उपचुनाव का उदाहरण भी इसी तर्क को मजबूत करता है। वर्ष 2023 में भाजपा को कांग्रेस के हाथों यह सीट गंवानी पड़ी, लेकिन 2024 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने सीट वापस हासिल कर ली। इसी चुनाव में भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन ने राज्य में 232 सीटें जीतकर मजबूत बहुमत प्राप्त किया। यानी उपचुनाव की हार स्थायी राजनीतिक बदलाव का प्रमाण नहीं बनी।
बांकीपुर में 34.24 प्रतिशत मतदान भी परिणाम के विश्लेषण में महत्वपूर्ण है। इतने कम मतदान में जीतने वाला उम्मीदवार निश्चित रूप से अपने समर्थक मतदाताओं को मतदान केंद्र तक पहुंचाने में सफल रहा, लेकिन इसे पूरे मतदाता वर्ग की राजनीतिक पसंद का पूर्ण प्रतिनिधित्व मानना कठिन है। कम मतदान में संगठित वोट बैंक और सक्रिय कार्यकर्ताओं की भूमिका बढ़ जाती है। इसलिए जीत का महत्व कम नहीं होता, लेकिन उसके राजनीतिक विस्तार का आकलन सावधानी से करना चाहिए।
ईवीएम को लेकर उठाए जा रहे सवालों पर भी राजनीतिक दलों को आत्ममंथन की जरूरत है। चुनाव परिणाम अनुकूल होने पर चुनावी प्रक्रिया को विश्वसनीय और प्रतिकूल होने पर ईवीएम को संदेह के घेरे में रखना लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास को कमजोर करता है। यदि किसी दल के पास ठोस तकनीकी या कानूनी आधार है तो उसे निर्धारित संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से सामने रखना चाहिए। केवल हार के बाद आरोप लगाना लोकतांत्रिक विमर्श को मजबूत नहीं करता।
इसलिए बांकीपुर का परिणाम राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन इसे बिहार की जनता का राज्यव्यापी फैसला मान लेना सही निष्कर्ष नहीं होगा। यह एक विधानसभा क्षेत्र के मतदाताओं का निर्णय है, जिसका सम्मान होना चाहिए। साथ ही इस परिणाम से सभी राजनीतिक दलों को स्थानीय मुद्दों, संगठन, उम्मीदवार चयन और मतदाताओं के साथ संवाद को लेकर आवश्यक सबक जरूर लेना चाहिए। वास्तविक राज्यव्यापी राजनीतिक दिशा का फैसला व्यापक जनभागीदारी वाले आगामी विधानसभा चुनाव में ही अधिक स्पष्ट रूप से सामने आएगा।
